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Saturday, 21 September 2013

हिन्दी गर्व की नहीं,बाजार की भाषा है ?

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पिछले दिनों हिन्दी-दिवस का शोर मचा हुआ था और मैने कहीं पढा कि एक समय था जब यू.पी. में बी.ए. के पहले साल में ही सत्तर प्रतिशत बच्चे जरनल इंग्लिश में फेल हो जाया करते थे | भला हो यू. पी. सरकार और आगरा विश्वविद्यालय के कुलपति का जिन्होने हिन्दी विषय का विकल्प देकर ग्रामीण परिवेश के बच्चों कोअंग्रेजी के आतंक से मुक्ति दिलाई | परन्तु आज के समय में, जब हर चीज का मापदंड बाजार हो गया है, हिन्दी भी इससे अछूती ना रह पाई |